श्री सदगुरवे नमः
सम्माननीय सत्संगी बंधु आप सभी के लिए महर्षि मेंहीं पदावली की प्रश्नोत्तरी-भाग 2 लेकर आया हूं। इसमें जितने भी प्रश्न है सभी महर्षि मेंहीं पदावली से पद्द से संबंधित करके प्रश्न और उनके उत्तर को सटीकता से समझाया गया है। अगर एक बार पढ़ेंगे तो दिल गदगद हो उठेगा। क्योंकि इसमें सबके मन में चलने, दिनचर्या में चलने वाले प्रश्न को शामिल किया गया है।जिसे पढ़कर खुद आश्चर्य करेंगे कि ऐसा ही प्रश्न मेरे मन में चल रहा था।जिसका सभी उत्तर मौजूद हैं। अतः सभी से सादर निवेदन है कि पूरा पढ़ें 👇 👇
6. भगवान् से भक्त को अनन्य प्रेम क्यों करना चाहिए
उत्तर -यदि कोई स्त्री एकमात्र अपने पति से लगकर रहती है।
दूसरे परुषों में अपना मन नहीं लगाती है. तो इससे उसके पति उमपा बड़े प्रसन्न रहते हैं। इसी प्रकार जो भक्त भगवान से अनन्य प्रेम रखना है, भगवान् उसपर बड़े प्रसन्न रहते हैं और उसके कल्याण की कापना करते हैं।
“गुरु तजि और न चित्त बसाइए, गुरु गुरु गुरु गुरु नित्त हे।
जपत रहिये ‘मैंहीं’ कर जोड़ी, गुरु चरनन धरि चित्त हे ॥”(१०६ ठा पद्य)
7. क्या ध्यानाभ्यास किये बिना किसी भी प्रवचनकर्ता को शान्ति मिल सकती है?
उत्तर -चाहे कोई संसार में चारो दिशाओं में घूम-घूमकर प्रवचन करता रहे और उसका प्रवचन सुनने के लिए लोगों की भारी भीड उमड़ती हो, फिर भी उसे ध्यानाभ्यास किये बिना कभी शान्ति नहीं मिल सकती –
“फिरै चहुँ दिशि जगत में, अरु वक्तृता देता फिर ।
ध्यान बिनु नहिं शान्ति आवै, लोगहू कितनहु घिरै ।।”
(१३७वाँ पद्य)
8. कोई सदैव गुरु की शरण में रहता है- इसकी क्या पहचान है?
उत्तर -जो सदैव गुरु की शरण में रहा करता है, वह सदैव
गुरु-मंत्र का मानस जप करता रहता है, वह नम्र होता है, उसमें सुबुद्धि होती है; वह प्रतिदिन सत्संग, स्तुति-प्रार्थना और ध्यानाभ्यास किया करता है। वह गुरु की मानसी सेवा-पूजा भी किया करता है। वह अपने को बड़ा नहीं दिखाता है। वह किसी से कुछ माँगता नहीं है. उसे अपने गुरु पर पूरा आशा-भरोसा होता है, वह प्रत्येक दिन सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करता है, वह पाप कर्मों से बचकर रहता है, उसे गरीबी का जीवन जीना अच्छा लगता है और वह परोपकार करने में लगा हुआ रहता है।
अति दीन होके जिसने, सत्संग सुमति ली ।
अपने को सोई ‘मँहीँ’, गुरु-शरण में कर ली ॥(६७ वाँ पद्य)
9. विपत्ति हमारे जीवन में नहीं आये – इसके लिए हम क्या करें?
उत्तर -विपत्ति से बचने के लिए हम सदैव गुरु के कथनानुसार काम किया करें, मनमाना कुछ भी नहीं करें और ध्यानाभ्यास करते रहें।
“गुरु-मंत्र जप गुरु-ध्यान कर, गुरु-सेव कर अति प्रीति कर ।
गुरु की आज्ञा मान प्यारे, कर सदा गुरु की कही ॥”
(६४ वाँ पद्य)
“गुरु को सिर पर राखिए, चलिए आग्याँ माहिं ।
कहै कबीर ता दास को, तीन लोक भय नाहिं ॥
सतगुरु सबद उलंघि के, जो सेवक कहिं जाय ।
जहाँ जाय तहँ काल है, कहै कबीर समुझाय ॥”(संत कबीर साहब)
१०. अपने कष्ट के निवारण के लिए हम क्या करें?
उत्तर -अपने कष्ट के निवारण के लिए हम दिन-रात जप करते रहें –
गुरु गुरु अति सुखद जाप, जापक जन हरत ताप ।
(८५ वाँ पद्य)
दुख दर्द भव के सब मिटें, सतगुरु चरण नित सेइए ।(६४ वाँ पद्य)
११. संसार में खुशहाल रहने का तरीका क्या है?
उत्तर -गुरु-मंत्र का जप करते रहना संसार में खुशहाल रहने का तरीका है
गुरु धन्य हैं गुरु धन्य हैं, गुरु धन्य दाता दयाल ।
सब मिल कहो जपते रहो जी, बने रहो खुशहाल ॥
(९५ वाँ पद्य)
🙏श्री सदगुरु महाराज की जय 🙏
ऊपर महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी -भाग 2 में जितने भी प्रश्न लेकर आए। पढ़ने के बाद यही मन होता होगा कि इसी तरह का सीरिज और भी होता तो बहुत बढ़िया होता। इसलिए मैं तरुण कुमार आप लोगों केलिए इसका महर्षि मेंहीं परमहंस जी महाराज द्वारा रचित पुस्तक महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी का भाग 1,पहले लेकर आए हैं उसको पढ़ें। उसके बाद महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी -भाग 2 को पढेंगे तो बहुत अच्छा लगेंगे।आप सभी के सेवा में इसका अगला भाग 3 भी भी लेकर आयेंगे।तब तक इसे पढ़कर। अधिक से अधिक शेयर करें और फोलो भी करें 🙏


जय गुरु महाराज ,🙏🙏🙏🙏