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महर्षि मेंहीं पदावली की प्रश्नोत्तरी-भाग 3

By tarunsantmat.com

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  1. मैं तरुण कुमार आप लोगों के लिए पूज्य स्वामी छोटेलाल बाबा रचित पुस्तक महर्षि मेंहीं पदावली की प्रश्नोत्तरी से प्रश्न और उत्तर का एक नया भाग 3 जिसका नाम दिए हैं। महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी -भाग 3 जिसमें कई प्रश्नों को बहुत ही आकर्षक तरीके से लिखा गया है।जिसे पढ़कर आप के मन आनंद से भाव विभोर हो जायेंगे। आइए महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी -भाग 3 का प्रश्न उत्तर नीचे पढ़ें 👇

Table of Contents

१२. पाप कर्म करने की आदत छोडने के लिए या अपने पाप कर्म के फल में कटौती लाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?

उत्तर -पाप कर्म छोड़ने के लिए हम संतों की संगति करने के साथ-साथ गुरु-मंत्र का जप सदैव करते रहें। संतों की संगति और ध्यानाभ्यास करते रहने पर भी पाप कर्म के फल में कटौती होती है-

सतगुरु सतगुरु नितहि पुकारत, छीजत पाप समूह रहे ।

(पद्य-सं० १०४)

मदद गुरू की हो अवगुण कम ।

(११४ वाँ पद्य)

१३. हम अपने कार्य पूरे करने के लिए क्या करें?

उत्तर -हम अपने कार्य पूरे करने के लिए उचित प्रयत्न के साथ-साथ सदाचार का पालन, गुरु की सेवा, सत्संग और गुरु-मंत्र का जप करते रहें –

 

गुरु गुरु गुरु कल्प विटप, गुरु गुरु गुरु ‘मेँहीँ’ जप ।

 

गुरु जाप जपन साँचो तप, सकल काज सारनं ।।

 

(९८ वाँ पद्य)

 

नित प्रति सत्संग कर ले प्यारा, तेरा कार्य सरै सारा ॥

 

(१३४ वाँ पद्य)

 

हाजत पूरै रहै न चाहा । हानि न गुरु सों होवत लाहा ।।

(११४वाँ पद्य)

 

जम दुख नासैं सारें कारज। जय जय जय प्रभु सत्य अचारज ॥

(११४ वाँ पद्य)

 

गुरु गुरु सब जाप भूप, अनुपम सत शान्ति रूप ।

 

उपमा में अति अनूप, दायक फल चारे ।।

(८५ वाँ पद्य)

१४. जो बहुत ठाट-बाट का जीवन जीता हो, जिसके भव्य भवन मणियों से जड़े हुए हों, जो अच्छे कुल का हो, जिसने अच्छा स्वास्थ्य तथा अच्छी शारीरिक सुन्दरता पायी हो और जिसकी पत्नी भी बहुत सुन्दर तथा सुशीला हो, क्या उसे भी ध्यान-भजन किये बिना सच्चा सुख नहीं मिलता होगा?

उत्तर- नहीं, उसे भी सच्चा सुख नहीं मिलता होगा –

मास फागुन मस्त होइ के, कियो बहुत बनाव हो ।

 

ऊँच महलन जटित मणिगण, सुख तबहुँ नहिं पाव हो । कूल भल अरु रूप भल अरु, त्रिया भल पायो सही।

 

सुख तबहुँ नाहीं मिले बिन, ध्यान के स्वपनहुँ कहीं ॥

(१३७ वाँ पद्य)

१५. परम मोक्ष-पद शीघ्र प्राप्त करने के लिए हम क्या करें?

यदि हम दिन-रात निरन्तर गुरु-मंत्र का जप करते रहें, तो परम मोक्ष पद की प्राप्ति हमें निश्चित रूप से शीघ्र हो जाएगी –

 

सर्व क्षण गुरु मन, जौं ‘मेंहीं’ रहै हो ।

 

निश्चय निर्वाण होय, सन्त सब कहैं हो ।

(९१ वाँ पद्य)

१६. जीवन में संकट या दुःख कष्ट आ जाने पर ‘महर्षि मँहीँ-पदावली’ के कौन-कौन-से पद्य बार-बार गाये जाने चाहिए?

उत्तर -जीवन में संकट या दुःख कष्ट आ जाने पर ‘महर्षि मेंहीं-

 

पदावली’ के निम्नलिखित दो पद्य बार-बार गाये जाने चाहिए –

 

(i)

 

जय जयति सद्‌गुरु जयति जय जय, जयति श्री कोमल तनुं ।

 

मुनि वेष धारण करण मुनिवर, जयति कलिमल दल हनं ॥

 

जय जयति जीवन मुक्त मुनिवर, शीलवन्त कृपालु जो ।

 

सो कृपा करिकै करिय आपन, दास प्रभु जी मोहि को ॥

 

जय जयति सद्‌गुरु जयति जय जय, सत्य सत् वक्ता प्रभू।

 

हरि कुमति भर्महिं सुमति सत्य को, पाहि मोहि दीजै अभू ॥

 

यह रोग संमृति व्यथा शूलन्ह, मोह के जाये सभै ।

 

अति विषम शर बहु होय बेध्यो, मोहि अब कीजै अझै ॥

 

प्रभु ! कोटि कोटिन्ह बार इन्ह दुख, मोहि आनि सतायेऊ ।

यहु बार जहु एक बचन आशा, आय तहू में समायेऊ ।। बिनु तुव कृपा को बचि सकै, तिहु काल तीनहु लोक में। प्रभु ! शरण तुव आरत जना तू, सहाय जन के शोक में ॥

 

(१६ वाँ पद्य)

 

(ii)

 

गुरु सतगुरु सम हित नहिं कोऊ, निसदिन करिये सेव हे। तन मन आतम रक्षक हैं गुरु, गुरुहिक नाम एक लेव हे ॥ मातहु तें बढ़ि छोह करें नित, पितहुँ तें अधिक भलाइ हे। कुल मालिकहु तें बढ़ि कृपा धारें, गुरु सम नाहिं सहाइ हे ॥ तन मन आतम पद पर वारिये, गुरु हित पटतर नाहिं है। निसदिन चरण शरण में रहिये, और न आन उपाइ हे ॥ जौं गुरु किरपा तनिहुँ विचारैं, मिटय कल्पना सोग हे। गुरु सम दाता साहिब नाहीं, गुरु गुरु जपिये लोग हे ॥ गुरु तजि और न चित्त बसाइये, गुरु गुरु गुरु गुरु नित्त है।

 

जपत रहिय ‘मेहीं’ कर जोड़ी, गुरु चरणन धरि चित्त हे ॥(पद्य-सं० १०६)

१७. गुरु के प्रति शिष्य का व्यवहार कैसा होना चाहिए?

उत्तर -शिष्य गुरु को संत मानकर उनका सेवन करे। उनसे कभी झूठ नहीं बोले, उनके प्रति छल-कपट का व्यवहार नहीं करे, सदैव उनके प्रेमरूपी अमृत का पान करता रहे, उनसे सदैव मौठे शब्दों में बातचीत करे और उनके प्रति कभी अहंकारपूर्ण व्यवहार नहीं करे। अहंकार से सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं। इसलिए गुरु के प्रति कभी अहंकारपूर्ण व्यवहार नहीं करे; जो गुरु के प्रति अहंकारपूर्ण व्यवहार करता है, वह संसार-समुद्र से कभी पार नहीं हो पाता है। ताको मानो गुरू सप्रीती। सेवो ताहि सन्त की नीती ॥ गुरु से कपट कछू नहिं राखो। उनके प्रेम अमिय को चाखो ॥ मीठी बोल बोलियो उनसे । अहंकार से सब कुछ बिनसे ।। सो उनसे कैभुं करियो नाहीं। नहिं तो रहिहौ भव ही माहीं ॥(४४ वाँ पद्य)

🙏🌹श्री सदगुरवे नमः 🙏 🌹 🙏

सत्संगी बंधुओं आप ऊपर महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी -भाग 3 जिसमें कई प्रश्नों को विस्तार पूर्वक विश्लेषण को पढ़ कर गदगद हो गए हैं।इसे और भी सत्संगी बंधुओं को शेयर करें और पूण्य का भागी बनें।

मैंने तो आप लोगों की सेवा में महर्षि मेंहीं पदावली प्रश्नोत्तरी -भाग 3 को बहुत ही अच्छे तरीके से लिखने का प्रयास किया हूं।अगर त्रुटियां हुई है तो कमेंट करें आपका इंतजार रहेगा।🙏

 

 

 

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मैं तरुण कुमार मधेपुरा बिहार से हूं। I am blogger and digital creator.

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