अपनी साखियों में संत क्या कहते हैं?
🙏जय गुरु 🙏
आज आप लोगों के लिए स्वामी छोटेलाल बाबा द्वारा रचित पुस्तक “अपनी साखियों में संत क्या कहते हैं? से बहुत ही सार गर्वित बातों को आप लोगों के लिए लाए हैं ।अगर आप पढ़ेंगे तो आपके मन में जो भी जिज्ञासा है उसका समाधान अवश्य होगा जो भी मन में प्रश्न है उसका उत्तर जरूर ही आपको मिलेंगे क्योंकि सभी प्रश्नों का उत्तर हमारे गुरु महाराज द्वारा रचित पुस्तक “महर्षि मेंहीं पदावली” में है। पदावली को तो सब पढ़ते हैं लेकिन उसका अर्थ बहुत ही गहन है। बहुत ही मार्मिक है। तो हम लोग लिए “अपनी साखियों में संत क्या कहते हैं? से प्रश्न और उत्तर का एक लंबा श्रृंखला का अवलोकन करते हैं ।जिससे आपके मन के संशय का समाधान हो सके।
.प्रश्न -अन्य पाप करने वाले हजारों लोगों से मिलना चाहिए; परन्तु निंदा करने वाले एक भी पापी से क्यों नहीं मिलना चाहिए?
उत्तर – दूसरे की निंदा करना सबसे बड़ा पाप है।एक निन्दक के निन्दक की संगति करने से होती है।
“निन्दक एकहु मति मिलै, पापी मिलौ हजार ।
इक निन्दक के सीस पर, कोटि पाप को भार ॥”
7. प्रश्न -जो मन में कोई आशा रखकर अपने धन का बहुत दान करता है, अगले जन्म में उसकी क्या दशा होती है?
उत्तर -जो मन में कोई आशा रखकर अपने धन का बहुत दान करता है, वह अगले जन्म में किसी का हाथी होता है।
“बहुत दान जो देत हैं, करि करि बहुतै आस ।
काहू के गज होहिंगे, खइहैं सेर पचास ॥”
8.प्रश्न- गुरु में किस चीज की विशेषता होती है?
उत्तर -गुरु में ज्ञान की विशेषता होती है। जिसमें ज्ञान नहीं है, वह गुरु बनाने के योग्य नहीं है। जो ज्ञान देने की क्षमता नहीं रखता है, वह गुरु नहीं है और जो ज्ञान सीखने की रुचि नहीं रखता है, वह शिष्य नहीं है।
“गुरू नाम है ग्यान का, सिष्य सीख ले सोय ।
ग्यान मरजाद जाने बिना, गुरु अरु सिष्य न कोय ॥”
9.प्रश्न -क्या कलियुग में सच्चे साधु का आदर नहीं होगा?
उत्तर -नहीं, कलियुग में सच्चे साधु का आदर नहीं होगा। कलियुग में कामी, क्रोधी और ढोंगी साधु की पूजा होगी।
“यह कलियुग आयो अबै, साधु न मानै कोय ।
कामी क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय ॥”
10.प्रश्न- अपने उद्धार के लिए क्या करना चाहिए और अपने को बिगाड़ने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर -अपने उद्धार के लिए नम्रता अपनानी चाहिए और अपने को बिगाड़ने के लिए अभिमानी बनना चाहिए ।
“लेने को सतनाम है, देने को अन दान ।
तरने को आधीनता, बूड़न को अभिमान ।।”
11.प्रश्न- साधन-भजन करने में बाधा न आए, इसके लिए क्या करें?
उत्तर -साधन-भजन में बाधा न आए, इसके लिए संसार की आसक्ति का त्याग करें और भगवान् तथा सत्संग से प्रेम करें।
“दुनिया सेती दोसती, होय भजन में भंग ।
एकाएकी राम सों, कै साधुन के संग ॥”
12.प्रश्न- इस संसार में अपना कौन है?
उत्तर – इस संसार में इष्टदेव को छोड़कर अपना कोई नहीं है, प्राण से सुरक्षित जो शरीर है, वह भी अन्त में अपना नहीं होता।
“तू मत जाने बाबरे, तेरा है सब कोय ।
प्रान पिंड सों बँधि रहा, सो नहिं अपना होय ॥”
13.प्रश्न- लड़ाई-झगड़े में हारकर रहनेवाले को क्या लाभ होता है?
उत्तर -जो लड़ाई-झगड़े में हारकर रहता है, वह भगवान् का प्यारा बनता है और जीतनेवाला व्यक्ति यमराज का मेहमान बनता है।
“हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार ।
हारा सतगुरु सों मिलै, जीता जम की लार ॥”
“अपनी साखियों में संत क्या कहते हैं?” के भाग १ में आठ प्रश्नों की श्रृंखला यहां पर प्रस्तुत किया। आपको पढ़कर मन के जो विकार हैं वह जरूर दूर हुए होंगे। ऐसा हमें विश्वास है ।इसी तरह के और भी मन में प्रश्न हो तो अगला “महर्षि मेंहीं पदावली की प्रश्नोत्तरी” श्रृंखला जारी है आप जरूर पढ़ें। सभी सत्संगी बंधुओं से निवेदन है कि अधिक से अधिक संख्या में जुड़े और शेयर भी करें।फोलो भी करें।

